गंगा बहती हो क्यों . … ?
( Bhupen Hazarika )
Lyrics By: नरेन्द्र शर्मा (हिन्दी)
Performed By:- भूपेन हज़ारिका ,
कविता कृष्णमूर्ति , हरिहरन , शान
बिस्तिर्नो पारोरे
, ओशोखोंक्यो जोनोरे
हाहाकार क्सुनिऊ , निशोब्दे निरोबे
बुरहा लुइत तुमि, , बुरहा लुइत , बुआ , कियो !
हाहाकार क्सुनिऊ , निशोब्दे निरोबे
बुरहा लुइत तुमि, , बुरहा लुइत , बुआ , कियो !
विस्तार है अपार , प्रजा दोनों पार
करे हाहाकार , निःशब्द सदा !
ओ गंगा तुम , ......................................... ओ गंगा बहती हो क्यूँ ?
नैतिकता नष्ट हुई , मानवता भ्रष्ट हुई !
निर्लज्ज भाव से , बहती हो क्यूँ ?
इतिहास की पुकार , करे हुंकार !
ओ गंगा की धार !
निर्बल जन को
सबल-संग्रामी ! समग्रोगामी ! बनाती नहीं हो क्यूँ ?
विस्तार है अपार ……..! ..................
अनपढ़ जन , अक्षरहिन ,, अनगीन जन , खाद्यविहीन !
नेत्रविहीन ! देख ! मौन हो , क्यूँ ?
इतिहास की पुकार , करे हुंकार ,, ओ गंगा की धार !
निर्बल जन , को सबल-संग्रामी ! समग्रोगामी !
बनाती नहीं हो क्यूँ ? ................
व्यक्ति रहे - व्यक्ति केंद्रत !
सकल समाज - व्यक्तित्व रहित !
निष्प्राण समाज को छोड़ती ना क्यूँ ?
निष्प्राण समाज को छोड़ती ना क्यूँ ?
इतिहास की पुकार ………........… ( @ )
रुदस्विनी , क्यूँ न रहीं ?
तुम निश्चय , चितन नही !
प्राणों में प्रेरणा ,
प्राणों में प्रेरणा ,
देती ना क्यूँ ? ?????
उनमद अवमी !
कुरुक्षेत्रग्रमी !
गंगे जननी ! नव भारत में ! भीष्मरूपी !
सुतसमरजयी !
जनती नहीं हो. क्यूँ ?
विस्तार है अपार |
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GLIMPSE OF CORRUPTION AND DEGRADATION OF MORAL VALUES IN THE
PRESENT CIVILIZATION SEEMS TO BE AT THE LOWEST LEVELS.THE PRESENT STATE OF AFFAIRS OF A HUMAN MIND , IRRESPECTIVE
OF AGE CASTE AND GENDER
EXPRESSES THE UTTER
DISILLUSIONMENT OF AN ENTIRE GENERATION !
IT ALSO DEPICTS .................................
THE IMMEDIATE SENSE OF UGLINESS !
EMPTINESS ! AND AIMLESSNESS OF OUR YOUTH .

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